महाशिवरात्रि
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महाशिवरात्रि

* महाशिवरात्रि का तात्त्विक मर्म *
जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकाररहित है, उस (परम सत्ता) का नाम ‘शिव’ है । ‘रात्रि’ मतलब आरामदायिनी, सुखदायिनी, शांतिदायिनी अवस्था ।
शिवस्वरूप में सुख देनेवाली यह महाशिवरात्रि है ।
* उपवास का वास्तविक स्वरूप *
भगवान शिव कहते हैं कि मैं धूप-दीप, पुष्प और फल-फूल अर्पण करने से भी इतना प्रसन्न नहीं होता हूँ जितना महाशिवरात्रि के उपवास से मैं प्रसन्न होता हूँ । अपने आत्मा के समीप जाने की जो व्यवस्था है, उसको बोलते हैं ‘उपवास’ । दूसरा अर्थ यह भी है कि हम अन्न न खायें । इससे जो अन्नादि को पचाने के लिए जीवनीशक्ति लगती है, उस दिन उसको आराम मिलेगा । यदि इस दिन ‘बं-बं’ बीजमंत्र का सवा लाख जप किया जाय तो जोडों के दर्द एवं वायुसंबंधी रोगों में लाभ होता है और भगवान शिव की प्रसन्नता प्राप्त होती है ।
* सुबह शुभ संकल्प करें *
महाशिवरात्रि की सुबह उठते समय बिस्तर पर ही संकल्प कर लेना कि ‘हे प्राणिमात्र के आधार ! आज का दिन मैं उपवास और मौन धारण करके तुम्हारा चिंतन करते-करते तुम्हारे स्वरूप में अधिक-से-अधिक विश्रांति पाऊँगा । मुझे परम लाभ की प्राप्ति करनी है ।’ ऐसा संकल्प करके उठना चाहिए और नहा-धोकर शिव-पूजन करें, ध्यान करें, जप करें, मौन रहें, रात्रि-जागरण करें ।
* महाशिवरात्रि का उत्तम पूजन *
महाशिवरात्रि की आराधना का एक तरीका यह है कि पत्र, पुष्प, पंचामृत, बिल्वपत्रादि से ४ प्रहर पूजा की जाय । दूसरा तरीका है कि तु शिवजी की मानसिक पूजा करो । उसके बाद अपनी वृत्तियों को निहारो । चित्त में जो-जो आ रहा है और जा रहा है, उसको निहारते-निहारते ‘मैं’रूप में टिक जाओ । तीसरा तरीका है कि जीभ न ऊपर हो न नीचे हो बल्कि तालू के मध्य में हो और जिह्वा पर ही आपकी चित्तवृत्ति स्थिर हो । इससे भी मन शांत हो जायेगा और शिवतत्त्व का साक्षात्कार करने की क्षमता प्रकट होने लगेगी ।
* महाशिवरात्रि का उत्तम जागरण *
रात्रि में जागरण करते हुए ‘ॐ... नमः... शिवाय...’ इस प्रकार प्लुत उच्चारण कर शांत होते जायें, ॐ...
नमः शिवाय जप करें । इसका बडा अद्भुत लाभ होता है । इस जागरण से आपके कई जन्मों के पाप-ताप, वासनाएँ क्षीण होने लगती हैं तथा बुद्धि शुद्ध होने लगती है एवं जीव शिवत्व में जागने के पथ पर अग्रसर होने लगता है ।
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