Stories Search

युवा जागृति संदेश

युवा जागृति संदेश

हे युवान ! गुलाम नहीं स्वामी बनो
अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के बढ़ते कुप्रभावों से गाँधीजी की यह बात प्रत्यक्ष हो रही थी कि 'विदेशी भाषा ने बच्चों को रट्टू और नकलची बना दिया है तथा मौलिक कार्यो और विचारों के लिए सर्वथा अयोग्य बना दिया है।"

अंग्रेजी भाषा और मैकाले शिक्षा-पद्धति की गुलामी  का ही परिणाम है कि आज के विद्यार्थियों में उच्छृंखलता,अधीरता व मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।

ऐसी अंग्रेजी शिक्षा से प्रभावित श्री अरविंदजी के विद्यार्थी राजाराम पाटकर को अपनी स्वतंत्र भाषा को छोड़कर अंग्रेजी भाषा में प्रभुत्व पाने का शौक हुआ । एक दिन मौका देखकर उसने श्री अरविंदजी से पूछा :"सर ! मुझे अपनी अंग्रेजी सुधारनी है,अतः मैं मैकाले पढ़ूँ ?"

श्री अरविंदजी एक देशभक्त तो थे ही,साथ ही भारत की सांस्कृतिक ज्ञान-धरोहर की महिमा का अनुभव किये हुए योगी भी थे । भारत में रहकर जिस थाली में खाया उसी में छेद करनेवालों की अंग्रेजों की कूटनीति को वे जानते थे। जिनका एकमात्र उद्देश्य भारतीय जनता को प्रलोभन देकर बंदर की तरह जिंदगी भर अपने इशारों पर नचाना था,ऐसे अंग्रेजों की नकल उनके विद्यार्थी करें यह श्री अरविंदजी को बिल्कुल पसंद नहीं था ।

उन्होंने स्वयं भी अंग्रेजों की अफसरशाही नौकरी से बचने के लिए आई.सी.एस. जैसी पदवी के लिए लैटिन और ग्रीक भाषा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने पर भी घुड़सवारी की परीक्षा तक नहीं दी ।

श्री अरविंद का मानना था कि हर व्यक्ति को अपनी सुषुप्त शक्तियों को जगाना ही चाहिए।
उन्होंने कड़क शब्दों में कहा :"किसी के गुलाम मत बनो। तुम स्वयं अपने स्वामी बनो ।"

उसकी सोयी चेतना जाग उठी। अपने सच्चे हितैषी के मार्गदर्शन को शिरोधार्य कर राजाराम ने मैकाले का अनुसरण नहीं किया। यही कारण था कि वह अपनी मौलिक प्रतिभा को विकसित कर पाया । 
यदि मैकाले का अनुसरण करता तो शायद वह  मात्र एक नकलची रह जाता ।

भारत के युवानों को गर्व होना चाहिए कि वे ऐसी भारत माँ की सौभाग्यशाली संतान हैं,जहाँ शास्त्रों और सद्गुरुओं का मार्गदर्शन सहज-सुलभ है। 

✍🏻आज ही प्रण कर लो  कि हम अंग्रेजों की गुलामी नहीं करेंगे,भारतीय शिक्षा-पद्धति ही अपनायेंगे।
अपने ऋषियों-महापुरुषों द्वारा चलायी गयी सर्वोत्कृष्ट गुरुकुल शिक्षा-पद्धति अपनाकर जीवन को महान और तेजस्वी बनाएंगे,समग्र विश्व में अपनी संस्कृति की सुवास फैलायेंगे।

 📚ऋषि प्रसाद/अप्रैल २०१३
Previous Article काली की वीरता
Next Article प्रतिभावना बालक रमण
Print
9997 Rate this article:
3.3
Please login or register to post comments.
RSS