सच्चे मन की सेवा,देती ईश्वरकृपा का मेवा

सच्चे मन की सेवा,देती ईश्वरकृपा का मेवा

‘‘जिसका सेवारूपी कर्मयोग सफल हो गया, भक्ति तो उसके घर की ही चीज है, ज्ञान तो उसका स्वभाव हो गया, देह का तो अभिमान ही चला गया ।" 

 -पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

 गाँव में प्लेग का भयानक रोग फैला था,रोज १-२ लोग मर रहे थे। सुंदरदास कई बार श्मशान जा-जाकर भयभीत हो सोचने लगे कि ‘गाँव छोड़कर शहर चले जायें तो ठीक, न जाने कल क्या हो जाय ? 
      उन्होंने झटपट सामान बाँधकर शहर जाने की तैयारी कर ली पर उनके बालक मलूक का तो कोई अता-पता ही नहीं था। 

चिंतातुर हो वे बेटे को खोजने निकल पड़े । काफी देर बाद पता चला कि बेटा घीसू चमार के घर उसकी पत्नी की सेवा में लगा है। घीसू कहीं दवा लेने गया है और नन्हा बालक घर पर अकेली बुखार में तप रही उसकी पत्नी के माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रख रहा है ।

पिता ने वहाँ पहुँचकर डाँटा : ‘‘इस भयंकर रोग का खतरा तुम क्यों मोल ले रहे हो ?
पर बालक का हृदय
परदुःखकातरता के भाव से सराबोर था।
मलूक ने आग्रह किया : ‘‘इस विपत्ति के समय में मैं इन माताजी को अकेले नहीं छोड़ सकता।" 

बालक अपनी सेवा पूरी करके घर लौटा। उसने देखा कि पिताजी गाँव छोड़ने की तैयारी में हैं । मलूक चुपचाप पूजा के स्थान पर जाकर सच्चे हृदय से भगवान से प्रार्थना करने लगा कि "हे प्रभु ! अब आप ही गाँव की प्लेग से रक्षा कर सकते हैं । हे दयामय ! कृपा करो नाथ ! हम गाँववाले अब आपकी शरण हैं..." भगवान को पुकारते-पुकारते वह शांत हो गया । 

थोड़ी देर बाद बाहर आकर उसने पिता से कहा : ‘‘पिताजी ! भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली है । अब प्लेग का प्रकोप अवश्य घटने लगेगा । हमें कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है ।

बेटे को डाँटने की ताक में बैठे पिता यह बात सुनकर और क्रोधित हो गये । तब मलूक विनम्रतापूर्वक बोला : 
‘‘पिताजी ! यह समय गाँव के लोगों की सहायता करने का है, उन्हें विपत्ति में छोड़कर जाने का नहीं है। यदि हमें इस दशा में छोड़कर गाँववाले चले जायें तो आपको कैसा लगेगा ? आप दो दिन और रुक जाइये । महामारी न रुके तो चले जायेंगे ।"

सत्संगी बेटे की सत्य से सराबोर वाणी से और परहितपरायणता से सुंदरदास का मन द्रवीभूत हो गया और
मलूक का भावपूर्ण आग्रह उन्होंने स्वीकार कर लिया । उस दिन के बाद प्लेग से मौत का सिलसिला रुक गया और धीरे-धीरे गाँव में स्वास्थ्य, सुख-शांति पुनः लौट आयी ।

 बचपन के परदुःखकातरता व सेवा के गुण ने आगे चलकर मलूक का द्वैत भ्रम मिटा दिया और वासुदेवः सर्वम्... की दिव्य दृष्टि उन्हें सहज में ही प्राप्त हुई । मलूक आगे चलकर संत मलूकदासजी के नाम से विख्यात हुए । आज भी जगन्नाथ मंदिर के निकट उनकी समाधि है। 

 उनका प्रसिद्ध दोहा है - 
 अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम । 
 दास मलूका यूँ कहे, सबका दाता राम ।। 



 ✍🏻 सीख : 

किसी भी फल की अपेक्षा से रहित कि गई सेवा से भगवान प्रसन्न होते हैं और स्वार्थ रहित की
गई प्रार्थना भगवान जल्दी सुनते हैं । बस भगवान पर विश्वास होना चाहिए । 

 ✒प्रश्नोत्तरी : 

 (क) मलूक ने प्लेग के रोग से पूरे गाँव की रक्षा कैसे की ? 
 (ख) भगवान का अर्थ क्या है ?
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