स्वामी विवेकानन्दजी की गुरुभक्ति

स्वामी विवेकानन्दजी की गुरुभक्ति

विश्वविख्यात स्वामी विवेकानन्दजी अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। 
श्री रामकृष्ण परमहंस के शरीर-त्याग के दिनों में वे अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किये बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किये बिना गुरुसेवा में सतत हाजिर रहते। 

गले के कैंसर के कारण रामकृष्ण परमहंस का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। गले में से थूक,रक्त,कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से एवं प्रेम से करते थे। 

एक बार किसी शिष्य ने श्री रामकृष्ण की सेवा में लापरवाही दिखायी तथा घृणा से नाक-भौहं सिकोड़ी। यह देखकर विवेकानन्द जी को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए वे उनके बिस्तर के पास रखी रक्त, कफ आदि से भी भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गये। 

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे गुरु के शरीर की और उनके दिव्यतम आदर्शों को लोगों तक पहुँचाने की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। 

स्वामी विवेकानंद गुरुभक्ति के विषय में कहते हैं- "स्वानुभूति ज्ञान की परम सीमा है, वह ग्रन्थों से नहीं प्राप्त हो सकती। पृथ्वी का पर्यटन कर चाहे आप सारी भूमि पदाक्रांत कर डालें, हिमालय, काकेशस, आल्पस पर्वत लाँघ जायें, समुद्र में गोता लगाकर उसकी गहराई में बैठ जायें, तिब्बत देश देख लें या गोबी (अफ्रीका) का मरुस्थल छान डालें, परंतु स्वानुभव का यथार्थ धर्मरहस्य इन बातों से, श्रीगुरु के कृपा-प्रसाद के बिना त्रिकाल में भी ज्ञात नहीं होगा। इसलिए भगवान की कृपा से जब ऐसा भाग्योदय हो कि श्रीगुरु दर्शन दे, तब सर्वान्तःकरण से श्रीगुरु की शरण लो, उन्हें ऐसा समझो जैसे यही परब्रह्म हों, उनके बालक बनकर अनन्यभाव से उनकी सेवा करो, इससे आप धन्य होंगे। ऐसे परम प्रेम और आदर के साथ जो श्रीगुरु के शरणागत हुए, उन्हीं को और केवल उन्हीं को सच्चिदानन्द प्रभु ने प्रसन्न होकर अपनी परम भक्ति दी है और अध्यात्म के अलौकिक चमत्कार दिखाये हैं।"
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