ज्ञान, वैराग्य, योग-सामर्थ्य की प्रतिमूर्ति साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज

ज्ञान, वैराग्य, योग-सामर्थ्य की प्रतिमूर्ति साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज

सर्दी का मौसम था। ब्रह्मवेत्ता संत साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज उनके अस्थायी निवास पर प्रवचन कर रहे थे। अचानक ही ठंड से थर-थर काँपती हुई एक बुढ़िया वहाँ पहुँची और हाथ जोड़के निवेदन करने लगीः "औ महाराज ! कुछ मेरा भी भला करो। मैं ठंड के मारे मर रही हूँ।"

साँईं जी अपने सेवक को बुलाकर कहा कि "कल जो रेशमी बिस्तर मिला था वह इस बुढ़िया को दे दो।" शिष्य ने सारा बिस्तर, जिसमें दरी, तकिया, गद्दा व रजाई थी, लाकर उस बुढ़िया को दे दिया और वह दुआएँ देती हुई चली गयी। जिस भक्त ने वह बिस्तर साँईं जी को दिया था, उससे रहा न गया। वह बोलाः "साँईं जी ! कम-से-कम एक दिन तो उस बिस्तर पर विश्राम करते तो मेरा मन प्रसन्न हो जाता।"

साँईं जी बोलेः "जिस पल बिस्तर तुमने मुझे दिया, उस पल से यह तुम्हारा नहीं रहा और जो तुमने दान में दिया वह दान में ही तो गया ! दुनिया में ʹतेरा-मेराʹ कुछ नहीं, जो जिसके नसीब में होगा वह उसे मिलेगा।" इस प्रकार भक्तों ने अद्वैत ज्ञान, वैराग्य एवं परदुःखकातरता का पाठ केवल पढ़ा ही नहीं, वह जीवन में किस प्रकार झलकना चाहिए यह प्रत्यक्ष देखा भी।

 दुश्मनों का बल निकाल रहा हूँ 
एक बार साँईं जी रस्सी के बल सुलझा रहे थे। पूछने पर बोले कि "भारत के दुश्मनों का बल निकाल रहा हूँ।" उन दिनों भारत-चीन युद्ध चल रहा था। दूसरे दिन समाचार आया कि "युद्ध समाप्त हो गया और दुश्मनों का बल निकल गया।"

 ब्रह्मनिष्ठ योगियों को भूत, वर्तमान एवं भविष्य काल – ये तीनों हाथ पर रखे आँवले की तरह प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए उऩके मार्गदर्शन एवं आज्ञा में चलने वालों को उनकी त्रिकालदर्शी दृष्टि का लाभ मिलता है। 

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इस प्रसंग द्वारा कौन-कौन से दिव्य गुण सीखने को मिलते हैं ?
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