श्रीकृष्ण की छेड़खानी

श्रीकृष्ण की छेड़खानी

भगवान का स्वभाव है छेड़खानी करके भी आपका अज्ञान मिटा देना । श्रीकृष्ण ने मक्खन-चोर मंडली बनायी । प्रत्येक घर का एक बच्चा शामिल हुआ । जिसके घर में बिलोना हो, मक्खन निकले, उस घर का लड़का आके बोले : ‘‘कल हमारे यहाँ बिलोना हुआ । श्रीकृष्ण बच्चों का टोला ले जायें, फिर मटकी तक पहुँचें और मक्खन खुद भी खायें,औरों को भी खिलायें क्योंकि कृष्ण को कंस के प्रति विद्रोह पैदा करना था । इतना कर (टैक्स) कि गरीब खाये नहीं, बाल-बच्चों को खिलाये नहीं,कर में ही मक्खन दें तो कर में मक्खन जाय उसके पहले ही कृष्ण बँटवा देते, खिला देते । 

प्रभावती नाम की गोपी बड़ी होशियार थी । वह यशोदा को फरियाद करती : ‘‘तुम्हारा लाला मक्खन चुरा लेता है और हम उसको पकड़ते हैं तो छटक जाता है । जिसके घर में बिलोना होता है,वह अटकल से मक्खन सुरक्षित करके पड़ोसी के घर में रख आता है या कंस के यहाँ भेज देता है तो तुम्हारा लाला बच्चों को बोलता है : जिस घर में हमारे लिए मक्खन नहीं है वह घर तो श्मशान है । 

यशोदा ने कहा : ‘‘ऐसी बातें तो बहुत लोग करते हैं, ‘कृष्ण छेड़खानी करते हैं,यह करते हैं, वह करते हैं... रू-बरू कोई मेरे को दिखाये कि कृष्ण ने मक्खन चुराया है । रँगे हाथ पकड़ के लाओ तो मैं बात मानूँगी । 

प्रभावती ने अपने बेटे को कहा : ‘‘मैं मक्खन निकाल रही हूँ,कृष्ण को जा के बताओ ।प्रभावती ने मक्खन निकाल के मटकी छींके में रखी और जान-बूझकर कुछ गोपियों को लेके पड़ोस के घर में यह सोचकर छुप गयी कि ‘कृष्ण का टोला आये तो हम कृष्ण को पकडेंगे । 

कृष्ण आये,देखा मक्खन तो है लेकिन चारों तरफ रस्सियाँ बँधी हैं और रस्सियों में घंटियाँ बँधी हैं । ज्यों ही हमारे मित्र कूदेंगे-फाँदेंगे तो घंटियाँ बजेंगी,दूर-दूर जो घर हैं उनको भी पता चलेगा और हमको पकडेंगे । 

कृष्ण ने अपना यौगिक संकल्प चलाया : ‘‘हे शब्दब्रह्म ! मेरी आज्ञा है, मैं ही नहीं बल्कि मेरा कोई भी गोप रस्सी को छुए, हिलाये तो भी आवाज नहीं होनी चाहिए । यहाँ भगवान ने अपना भगवत्स्वभाव भी दिखाया, भगवत्सामर्थ्य भी दिखाया और छेड़खानी तो थी ही । 

बच्चे कूदे-फाँदे, घंटियों की आवाज नहीं आयी । लडकों ने घेरा बनाया । लडकों के कंधों पर लड़के चढ़ गये, उन पर फिर लड़के... जैसे पिरामिड बनाते हैं । आखिर में कृष्ण पहुँचे । छींके में से मक्खन की मटकी निकाली । आज तक तो वे पहले दूसरों को खिलाते थे बाद में स्वयं खाते थे लेकिन ‘प्रभावती थोड़ी चंट है, आज न जाने कहीं धतूरा मिलाया हो, दूसरी कुछ गड़बड़ की हो तो... - ऐसा सोचकर श्रीकृष्ण मक्खन पहले खुद चखते हैं । ज्यों ही चखते हैं त्यों ही घंटियाँ बजने लग गयीं । 

प्रभावती और कुछ सखियाँ दौड़ती आयीं । कृष्ण ने कहा : ‘‘ऐ शब्दब्रह्म,हाजिर हो जा ! (शब्दब्रह्म हाजिर हो गया ।) मैंने आज्ञा दी थी कि घंटियाँ नहीं बजनी चाहिए, क्यों बजीं ?
बोले : ‘‘प्रभु ! आपकी ही आज्ञा का हमने पालन किया है। शास्त्र भी तो आपके ही वचन हैं । शास्त्रों में लिखा है कि और समय घंटी बजे चाहे न बजे लेकिन प्रभु को जब भोग लगता हो तो घंटियाँ अवश्य बजनी चाहिए । कृष्ण बोले : ‘‘तू भी बड़ा चालाक है, अब आ रही है तेरी माँ । 

प्रभावती दौड़ी आयी और श्रीकृष्ण को रँगे हाथ पकड़ लिया । हाथ में मक्खन,मुख पर मक्खन... प्रभावती बोलने लगी : ‘‘अब यशोदा को बताऊँगी कि मैं हवाई तीर नहीं  छोड़ती थी । तेरा लाला चोर है, पक्का चोर ! चल ! उसका बेटा बोलता है : ‘‘मैया !छोड़ दे न, छोड़ दे ! तुम्हीं ने तो कहा था, ‘लाला को बोलना हमारे घर मक्खन बना है । फिर तुम्हीं उसको पकड़ती हो... मेरे को पकड़ ले,लाला को छोड़ दे।
‘‘धत् तेरे की,तेरे को पकड़ क्या करना है ! लाला को पकड़ने के लिए रात जगी हूँ रात ! यह सब बाँधा है, सब बनाया है।

कृष्ण ने देखा कि यह छोड़ेगी नहीं । रास्ते में प्रभावती के ससुर का खेत था। कृष्ण ने मुँह उधर करके उसके ससुर की आवाज में खाँसते हुए कहा : ‘‘ऐ प्रभावती ! ऐ प्रभावती ! तू कहाँ जा रही है ?वह जमाना घूँघट का था । प्रभावती ने घूँघट खींच लिया और हाथ के इशारे से जिस ओर जा रही थी उधर का इशारा कर दिया । कृष्ण ने देखा कि अब तो घूँघट खींच लिया है । 

कृष्ण बोले : ‘‘तू तो छोड़ेगी नहीं मेरा हाथ लेकिन इतना जोर से तूने पकड़ा है कि हाथ दर्द करने लगा है । मेरा दायाँ छोड़ के बायाँ हाथ पकड़ ले न ! प्रभावती ने हाथ ढीला कर दिया और कृष्ण ने उसके छोरे का बायाँ हाथ पकड़ा दिया और खुद छटक गये । 

वह घसीटते-घसीटते अपने छोरे को ले जा रही है, उसको पता नहीं । कृष्ण पीछे के रास्ते से पहुँच गये अपने आराम के कमरे में और लेटकर लीला की : ‘‘मैया-मैया !"
यशोदा दौड़ी बोली : ‘‘क्या है लाला ?
 ‘‘मैया ! मेरे को तो स्वप्न में प्रभावती दिख रही है।आँखें दिखा रही है कि मैं तेरे पर आरोप लगाऊँगी,पकड़के यशोदा मैया के पास ले जाऊँगी । ऐसा दिख रहा है मेरे को । 

इतने में दरवाजे से खट-खट की आवाज आयी । यशोदा : ‘‘कौन है ?
 ‘‘प्रभावती । 
‘‘क्यों आयी है ? 
‘‘तेरे कन्हैया को पकड़ के लायी हूँ ।
 ‘‘लाला ! तू सच कह रह्यो है । यशोदा सोचती है, ‘कन्हैयो तो मेरो यहाँ सोयो है, लालो । गाय की पूँछ तो नहीं है लेकिन साड़ी का पल्ला तो है, उसीसे मेरो लालो पर उतारा कर देती हूँ । वह निगुरी है ही ऐसी । ‘‘अरे ! तू किसको पकड़ के लायी ?
 ‘‘तेरो लालो पकड़ के लायी हूँ।‘‘
कन्हैया तो यहाँ लेटा है ।

यशोदा गयी,दरवाजे की दरार से देखा कि प्रभावती का घूँघट नीचे तक खिंचा हुआ है और हाथ में उसके छोरे का हाथ है । फटाक्-से दरवाजा खोला । 
बोली : ‘‘कहाँ है मेरा लाला ?
‘‘यह रहा ।‘‘
घूँघट तो ऊपर कर ! घूँघट ऊपर किया : ‘‘अरे छोरा ! तू कैसे आ गयो रे ? कृष्ण वहाँ ठेंगा और जीभ दिखा रहे हैं : ‘‘ले-ले ! 

यह छेड़खानी करके भी प्रभावती की बुद्धि के अहं को हटाकर शांति का दान, रस का दान देने की लीला है । ऐसे ही आप भी संसार में कहीं-कहीं बिल्कुल रुक जाते हो तो भगवान आपको थोड़ा हिलाकर अपनी तरफ खींचने की छेड़खानी करते रहते हैं ।

सीख : भगवान हमारा अहम् मिटाकर हमारे अंदर अंतरात्मा का प्रेम और माधुर्य भरना चाहते हैं इसीलिए सारी लीलाएँ करते हैं ।
✒प्रश्नोत्तरी : कृष्ण ने कैसे अपना हाथ प्रभावती से छुड़ाके उसके बेटे का हाथ थमा दिया ?

📚बाल संस्कार पाठ्यक्रम से
Previous Article चुप साधन
Next Article तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया
Print
405 Rate this article:
4.0

Please login or register to post comments.