तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया

"बाँकेबिहारी के बाह्य रूप की पूजा करने के साथ उनके उपदेश को भी समझे।"
           -पूज्य श्री

बालक आसुमल भगवत्प्रार्थना,कीर्तन व ध्यान के बड़े प्रेमी थे। वे भालकिया बस स्टैंड (अहमदाबाद) के पास स्थित रामजी मंदिर में भगवन्नाम-कीर्तन में बड़े ही तल्लीन हो जाते थे और फिर ऐसे ध्यानस्थ हो जाते कि समय का भान ही नहीं रहता था कि कितना समय बीता । 

पूज्यश्री के सत्संग में आता है ‘‘बचपन में हम रोज मंदिर में जाके प्रार्थना व कीर्तन करते थे।

अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायक रामचन्द्रं भजे ।।।
(अच्युताष्टकम् १)

कीर्तन करनेवालों में भी हम सबके अगुआ। थे।... 
‘तुलसी मस्तक तब नवै धनुष-बान लो हाथ ।।'
 यह गाकर उस समय ‘जय सियाराम' कर लेते थे पर अब पता चला इसका रहस्य कि संत तुलसीदासजी ने आम जन का ज्ञान बढ़ाने के लिए ऐसा हठ ले लिया था - वे श्रीकृष्ण की मूर्ति देखकर बोले ''ये तो बाँकेबिहारी हैं, मैं तो रामजी को प्रणाम करूंगा।'' और वे बाँकेबिहारी रामजी बन गये। 

तो लोगों को सोचने का मौका मिला कि 'भई देखो, ऐसा भी हो सकता है !' व्यक्ति उस अच्युत की लीला देखने-समझने के बहाने भी आये और विश्रांति पाये। केवल बाहर के बाँकेबिहारी में ही रुक न जाय बल्कि उनके तत्वरूप का ज्ञान पा के मुक्त हो जाय। बाँकेबिहारी के बाह्य रूप की पूजा करने के साथ उनके उपदेश को भी समझे। वे उपदेश देते हैं कि

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।

'उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ। उनको भलीभाँति दंडवत प्रणाम करने से,उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वह परमात्मा-तत्व को भलीभाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे।'
 
कभी-कभी संतों के द्वारा भी वह अच्युत खेल करवा लेता है। कैसी व्यवस्था है उसकी !!

 📚 ऋषि प्रसाद /जुलाई २०१८
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