भारतीय संस्कृति की अनमोल विरासत

भारतीय संस्कृति की अनमोल विरासत

१८ दिसम्बर १९२७! गोरखपुर जेल की कालकोठरी में एक माँ अपने बेटे से आखिरी मुलाकात करने आयी है। माँ जानती थी कि उसके बेटे ने निर्दय अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिये हैं। उसके बेटे के साथ अनेक देशप्रेमी युवक भी हैं जिनका आजादी ही एकमात्र उद्देश्य है। ऐसे स्वाभिमानी युवकों का नायक है उसका बेटा कल भारत माता की आजादी की बलिवेदी पर उसे चढ़ा दिया जायेगा।

आखिरी मुलाकात का ऐतिहासिक क्षण ! अपने साहस से अंग्रेज सरकार के सिंहासन को हिला देनेवाले बेटे का फौलादी कलेजा माँ को देखते ही भाव से भर गया। आँखों से अश्रुधाराएँ है बह चलीं । सामने वह ममतामयी माँ खड़ी थी जिसने जन्म दिया, अपने दूध के साथ देशभक्ति व भारतीय संस्कृति के दिव्य संस्कार दिये।

लेकिन यह क्या !... माँ निश्चल खड़ी बेटे की ओर बड़ी चुभती नजरों से एकटक देख रही है। मानो उसकी आँखों से आँसू नहीं अंगारे निकल रहे हों । माँ ने तीखे स्वर में कहा ''तू रो रहा है! तुमने आज मेरे बरसों के विश्वास को धोखा दिया है। मैं बरसों से यह समझती रही कि मेरा बेटा एक सच्चा देशभक्त है। वह तो अपनी मोह-ममता तथा तुच्छ इच्छाओं से ऊपर उठकर देशहित के लिए अपने जीवन का बलिदान करने जा रहा है। मैं बरसों से यह भ्रम मन में पालती रही कि दुश्मनों को मेरे बेटे का नाम ही कँपा देने के लिए काफी है। मैं नहीं जानती थी कि मेरा बेटा अपने देशहित व धर्म के पथ पर चलने में परिवार की मोह-ममता का सहारा लेकर आँसू बहायेगा । धिक्कार है मुझे।"

 यह कहते हुए माँ वापस जाने को हुई तो बेटे ने गम्भीरता से कहा ''नहीं माँ हरगिज नहीं तुम्हारी कोख से जन्म लेकर ऐसी नीचता कैसे हो सकती है!
मैं तो आज तक समझता रहा कि माँ तो ममता की मूर्ति होती है। बेटे की इस स्थिति को देखकर वह पिघल जायेगी परंतु आप तो... आप जैसी माता को पाकर मैं धन्य हो गया । आपका बेटा मौत से नहीं डरता । ये आँसू तो अपनी सद्गुणों की साक्षात् मूर्ति माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए थे।'' 

बेटे ने आँसू पोंछकर मुस्कराते हुए कहा । ''माँ, अब तो खुश हो न?'' यह सुनकर माँ के होंठों पर गर्वभरी मुस्कराहट आ गयी। 

वह जन्मदात्री थी रामप्रसाद बिस्मिल की माँ । बिस्मिलजी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं ''यदि मुझे ऐसी माता न मिलती तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसारचक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता ।मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेवजी की कृपा का ही परिणाम है। वास्तव में मेरे गुरुदेव की शिक्षाओं ने ही मेरे जीवन में आत्मिक बल का संचार किया।'' 

📚लोक कल्याण सेतु /जनवरी २०१५

✍🏻 निवेदन: अपने आस पड़ोस के बच्चों को सप्ताह में एक दिन,एक-दो घंटे के लिए इकठ्ठा करके बाल संस्कार केन्द्र चलाने की सेवा आप कर सकते हैं, बच्चों को केन्द्र में मिले अच्छे संस्कारों से उनके भीतर छुपी महानता भी प्रगट होने लगती है और वे भी उन्नत होने लगते हैं ।
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