प्रार्थना और ध्यान से असाध्य रोगों को कैसे रखें दूर !

असाध्य बीमारियों में औषध के साथ प्रार्थना और ध्यान भी अत्यन्त आवश्यक है
हमारे ऋषि मुनियों तथा योगियों ने प्रेम, श्रद्धा, पूजा (प्रार्थना) तथा जप ध्यान के द्वारा मानव के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। 

भारत के इन महापुरूषों के ऐसे सूत्रों के अमिट प्रभाव को आज के विज्ञान को भी स्वीकार करना पड़ रहा है। अनेक शोधकर्त्ताओं ने भारतीय शास्त्रों का अध्ययन करके उनमें बताये गये सूत्रों को विज्ञान की आधुनिक पद्धति द्वारा सिद्ध करने का प्रयास किया तथा कुछ को उसमें आंशिक रूप से सफलता भी मिली।

🌹अर्वाचीन वैज्ञानिक भी मानते हैं कि प्रेम,श्रद्धा,प्रार्थना एवं ध्यान के द्वारा चमत्कारिक रोग प्रतिकारक शक्ति पैदा होती है। यही क्षमता असाध्य माने जाने वाले रोगों को भी मिटाने में अत्यधिक मददरूप बनती है।
चेरिंग क्रॉस अस्पताल के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. पीटर निक्सन ने कोरोनरी थ्रोम्बोसिस और ऐक्यूट हार्ट डिसीसेज़ के इलाज के लिए 'केबल इन्टेसिव केयर यूनिट' (ICU) का ही नहीं अपितु 'ध्यान' का प्रयोग करके आश्चयर्जनक सफलता प्राप्त की। डॉ. निक्सन ने अपने मरीजों को 'ह्यूमन फंक्शन कर्व' सिखाया जिससे शीघ्र ही दर्द का शमन हो जाता है।
🌹 उच्च रक्तचाप के मरीजों का रक्तचाप इस प्रयुक्ति से स्वतः ही सामान्य हो जाता है।
सॉन फ्रांसिस्को को जनरल हॉस्पिटल के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. रेन्डोल्फ बायर्ड द्वारा एक प्रयोग किया गया है। डॉ. रेन्डोल्फ ने ऐसे आठ सौ मरीजों को चुना जिनकी हृदय रोग होने के कारण सर्जरी की जाने वाली थी। इनमें से चार सौ मरीजों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए अलग-अलग स्थानों के प्रार्थना की गई। डॉ. रेन्डोल्फ ने जब अपने प्रयोग को परिणाम निकाला तो स्वयं भी आश्चर्यचकित हो गया। अमेरिकन हार्ट एसोसियेशन की बैठक में डॉ. रेन्डोल्फ ने बताया कि 'जिन मरीजों के लिए प्रार्थना पद्धति का उपयोग किया गया था वे मरीज सर्जरी में होने वाली दुर्घटनाओं तथा सर्जरी के बाद होने वाले इन्फेक्शन के शिकार नहीं बने।'

उपरोक्त सभी प्रयोग स्थूल वस्तुओं पर किये गये हैं परन्तु भारतीय ऋषियों के इन सूत्रों का प्रभाव यहीं तक सीमित नहीं रहता। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज के विज्ञान की खोजें जिस छोर पर जाकर समाप्त हो जाती हैं अर्थात् आज के विज्ञान का जहाँ पर अन्त होता है वहाँ से भारत के ऋषि-विज्ञान का प्रारम्भ होता है। इसीलिए जिन सूत्रों को कभी विज्ञानियों ने आडम्बर तथा अंधश्रद्धा कहा था आज उन्ही सूत्रें के द्वारा वे अपने तथाकथित विकसित विज्ञान को आगे बढ़ा रहे हैं।
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