वैदिक मंत्रशक्ति का अद्भुत सामर्थ्य

वैदिक मंत्रशक्ति का अद्भुत सामर्थ्य

‘‘दवाई से बुखार शायद न भी उतरे परंतु मंत्रशक्ति से निश्चित ही उतर जायेगा । आप कहें तो प्रयोग करूँ ?’’

योगी अरविंद कर्म को आध्यात्मिक शक्तियों से सराबोर करके जीवन जीने में विश्वास रखते थे । और यही कारण है कि देश को स्वतंत्र कराने में भी उन्होंने वैदिक मंत्रशक्ति, योगशक्ति, भगवद्विश्रांति व भगवद्-आश्रय आदि साधनों का खूब लाभ लिया ।

कर्म को अध्यात्म का सम्पुट देने की प्रेरणा योगी अरविंद को तब मिली जब एक बार उनके छोटे भाई बारीन्द्र को विषैला बुखार हो गया । अरविंदजी ने कई उपाय किये किंतु किसी भी उपचार से बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था । तभी एक नागा संन्यासी उनके घर आये । बारीन्द्र की नाजुक हालत देखकर उन्होंने दावा करते हुए कहा : ‘‘दवाई से बुखार शायद न भी उतरे परंतु मंत्रशक्ति से निश्चित ही उतर जायेगा । आप कहें तो प्रयोग करूँ ?’’
मंत्रों में अद्भुत शक्ति होती है । औषधियों का प्रभाव केवल हमारे स्थूल शरीर तक ही सीमित होता है जबकि मंत्रों का प्रभाव तो हमारे स्थूल शरीर के साथ सूक्ष्म शरीर, मन, बुद्धि, 7 केन्द्रों व 5 कोषों पर भी बड़ा गहरा पड़ता है । 

अरविंदजी की सहमति मिलने पर साधु ने पानी में देखकर कोई मंत्र पढ़ा और वह पानी बारीन्द्र को पीने को दिया, फिर बोले : ‘‘अब बुखार नहीं आयेगा ।’’ वे साधु चले गये और थोड़ी देर बाद बारीन्द्र का बुखार हमेशा के लिए चला गया ।

दैनिक व्यवहार में मंत्रशक्ति का यह अद्भुत उपयोग देखकर अरविंदजी को लगा कि ‘क्यों न योग-साधना द्वारा प्राप्त शक्तियों का उपयोग देश की स्वतंत्रता के लिए किया जाय !’ अतः वे योग की ओर मुड़ गये । 

🌹एक बार किसी कार्यकर्ता ने उनसे पूछा : ‘‘गांधीजी तो स्वतंत्रता हेतु इतना कार्य कर रहे हैं और आप यहाँ एकांत में योग-साधना कर रहे हैं ! आप गांधीजी के साथ मिलकर स्वतंत्रता में सहयोग क्यों नहीं देते हैं ?’’ 
योगी अरविंद ने बड़ा ही सारभूत उत्तर 
दिया : ‘‘यह जरूरी नहीं कि प्रत्यक्षरूप से ही सभी कार्य होते हों । हम बाह्यरूप से कुछ न करते हुए भी दिखें फिर भी भीतर बैठकर ऐसा कुछ कर रहे हैं कि भारत शीघ्र ही स्वतंत्र होगा । भगवद्विश्रांति व मंत्रशक्ति सब सामर्थ्यों का मूल है ।’’ 
और इसी परमात्म-विश्रांति व मंत्र-विज्ञान का आश्रय लेकर योगी अरविंद ने देश को स्वतंत्र कराने में प्रत्यक्ष के साथ-साथ सूक्ष्मरूप से भी बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । 

मंत्र-विज्ञान भारत की महान संस्कृति की बहुमूल्य धरोहर है । मंत्रों में भौतिक व आध्यात्मिक शक्तियाँ विकसित करने का अलौकिक सामर्थ्य होता है । मंत्र यदि वैदिक हो और किन्हीं समर्थ ब्रह्मज्ञानी सद्गुरु के श्रीमुख से मिल जाय तथा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उसका जप किया जाय तो व्यक्ति सहज में ही लौकिक लाभों के साथ-साथ परम लाभ परमात्मप्राप्ति भी कर सकता है ।

पूज्य बापूजी के साधकों के जीवन में भी मंत्रशक्ति से रोगमुक्ति, व्यावहारिक क्षेत्र में प्रगति, संतानप्राप्ति, कलह-निवृत्ति, स्पर्धा में 25-25 लाख रुपये की जीत, 5 साल का बालक कार चलाकर किसीकी जान बचा ले - ऐसे अनेक अनुभव प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं ।

पूज्य बापूजी के नजरिये के अनुरूप जीवनयापन करने से, मंत्रशक्ति से, मंत्र-अनुष्ठान से सुषुप्त शक्तियों का सर्वांगीण विकास करने की कला प्राप्त होती है, यह विश्वविदित है । बापूजी के साधक, मंत्रदीक्षित लोग मंत्रशक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से कितने लाभान्वित हुए हैं, वह लाबयान है । एक-एक साधक के अनुभवों का एक भागवत या पोथी जैसा ग्रंथ बन सकता है ।

धिक् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं बलम् ।

सत्ता और डंडे का बल बेकार है । मंत्रशक्ति, आध्यात्मिकता और भगवद्बल ही बल है । दुर्घटना में हेलिकॉप्टर के पुर्जे-पुर्जे बिखर जाने पर भी पूज्य बापूजी का बाल भी बाँका न होने की अद्भुत घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । 

मंत्रशक्ति से बुखार चला जाना यह बहुत छोटी बात है । बड़े-बड़े डॉक्टरों ने कहा कि ‘‘माताजी (पूज्य बापूजी की माताजी) एक दिन से ज्यादा नहीं जी सकतीं ।’’ कहते कि ‘‘लीवर खराब है, किडनी खराब है, दो मनके घिस गये हैं ।’’ श्रद्धामूर्ति बापूजी की माँ मंत्रशक्ति से कई वर्ष जीवित रहीं यह दुनिया जानती है । देश-विदेश के डॉक्टर दंग रह गये । बुखार मिटाने का एवं मुकदमे में जीत का मंत्र, रोजी-रोटी पाने का एवं आरोग्यप्राप्ति का मंत्र... न जाने क्या-क्या बापूजी के प्यारों को तोहफा मिलता रहता है । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के वचन व अनुभव आश्रम से प्रकाशित ‘दिव्य प्रेरणा-प्रकाश’ पुस्तक में पढ़ने योग्य है ।          
(लोक कल्याण सेतु, जुलाई 2013)
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