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शिष्य के हृदय की पुकार सद्गुरु तक अवश्य पहुँचती है

शिष्य के हृदय की पुकार सद्गुरु तक अवश्य पहुँचती है

सन् 2006 की बात है । पूज्य बापूजी पेठमाला (गुज.) के एकांत आश्रम में निवास कर रहे थे । एक दिन शाम को सत्संग सम्पन्न हुआ,गुरुदेव कुटिया में चले गये । रात को लगभग 10.30 बजे एकाएक बापूजी कुटिया से बाहर आये ।

 स्वयं गाड़ी लेकर रसोईघर पहुँचे (कुटिया से रसोईघर दूर था), भोजन लिया और आश्रम के मुख्य द्वार की ओर चल दिये ।

प्रायः यह देखा गया है कि बापूजी रात्रि में किसी सोते हुए सेवक को नहीं जगाते और कोई जगाता हो तो उसे मना कर देते हैं। पूज्यश्री ने न तो वाहन-चालक को जगाया और न ही रसोई-
सेवक को ।

बाद में पता चला कि कुछ भक्त दूर से आये थे और उन्हें पूज्यश्री के दर्शन नहीं हो सके थे तो वे मुख्य द्वार पर गुरुदेव के दर्शन की आस में बैठे थे । जब अचानक बापूजी वहाँ पहुँचे तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा । दर्शन करके सभी आनंदित हो गये । 

बापूजी ने पूछा : ‘‘तुम लोगों ने भोजन किया ? भक्तों ने गर्दन हिलाकर नहीं का इशारा किया । गुरुदेव ने अपने हाथों से सबको भोजन परोसा । इतना अपनापन, इतनी उदारता और करुणा देखकर सबके हृदय गद्गद हो गये।

दूसरे दिन उन भक्तों ने आश्रमवासी भाइयों से कहा कि ‘‘हम लोग केवल दर्शन की आस लिये आये और बैठे थे लेकिन जो मिला वह जीवन में कभी भूल नहीं पायेंगे ।"

📚बाल संस्कार पाठ्यक्रम
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