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गंगा जल पीकर प्रेत की हुई मुक्ति

गंगा जल पीकर प्रेत की हुई मुक्ति

एक ब्राह्मण प्रयागराज से 5 कोस (1 कोस = करीब2 मील) की दूरी पर रहता था । वह प्रत्येक संक्रांति के दिन स्नान करने के लिए प्रयाग में जाया करता था । माघ मास की संक्रांति के दिन तो वह अपने परिवारसहित अवश्य ही वहाँ जाता था । 

जब वह ब्राह्मण बूढ़ा और चलने में असमर्थ हो गया, तब एक बार माघ की संक्रांति आने पर उसने अपने पुत्र को बुलाकर कहा : ‘‘हे पुत्र ! तुम प्रयागराज जाओ, त्रिवेणी में स्नान करके मेरे लिए भी त्रिवेणी के जल की गागर भरकर लाना और संक्रांति के पुण्यकाल में मुझे स्नान कराना, देर मत करना । 

पिता के वचन का पालन करते हुए उसका पुत्र प्रयाग के लिए चल पड़ा । त्रिवेणी में स्नान कर जब वह जल से भरी गागर पिता के स्नान के लिए ला रहा था तो रास्ते में उसे एक प्रेत मिला । वह प्यास के कारण बहुत व्याकुल हो रहा था और गंगाजल पीने की इच्छा से रास्ते में पड़ा था । 

लड़के ने प्रेत से कहा : ‘‘मुझे रास्ता दो । प्रेत : ‘‘तुम कहाँ से आये हो ? तुम्हारे सिर पर क्या है ? 
‘‘त्रिवेणी का जल है ।‘‘
"मैं इसी इच्छा से रास्ते में पड़ा हूँ कि कोई दयालु मुझे गंगाजल पिलाये तो मैं इस प्रेत-योनि से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि मैंने गंगाजल का प्रभाव अपने नेत्रों से देखा है । 
‘‘क्या प्रभाव देखा है ?"

 एक ब्राह्मण बड़ा विद्वान था । उसने शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय प्राप्त करके बहुत धन उपार्जित कर रखा था । लेकिन क्रोधवश उसने किसी ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण को मार दिया । उस पाप के कारण मरने पर वह ब्रह्मराक्षस हुआ और हमारे साथ 8 वर्षों तक रहा । 8 वर्षों के बाद उसके पुत्र ने उसकी हड्डियाँ लाकर श्रीगंगाजी के निर्मल तीर्थ कनखल में डालकर गंगाजी से प्रार्थना की : ‘हे पापनाशिनी गंगा माते ! मेरे पिता को सद्गति प्रदान कीजिये । तब तत्काल ही वह ब्राह्मण ब्रह्मराक्षस भाव से मुक्त हो गया । 

उसीने मरते समय मुझे गंगाजल का माहात्म्य सुनाया था । मैं उसको मुक्त हुआ देखकर गंगाजल-पान की इच्छा से यहाँ पड़ा हूँ । अतः मुझको भी गंगाजल पिलाकर मुक्त कर दे, तुझे महान पुण्य होगा । 

‘‘मैं लाचार हूँ क्योंकि मेरे पिता बीमार हैं और उनका संक्रांति के स्नान का नियम है । यदि मैंने यह गंगाजल तुझे पिला दिया तो स्नान के पुण्यकाल तक न पहुँचने के कारण मेरे पिता का नियम भंग हो जायेगा ।" 
‘‘तुम्हारे पिता का नियम भी भंग न हो और मेरी भी सद्गति हो जाय, ऐसा उपाय करो । पहले मुझे जल पिला दो,फिर नेत्रबंद करने पर मैं तुम्हें तत्काल श्रीगंगाजी के तट पर पहुँचाकर,तुम्हारे पिता के पास पहुँचा दूँगा ।"

ब्राह्मणपुत्र ने प्रेत की दुर्दशा पर दया करके उसे जल पिला दिया । तब प्रेत ने कहा : ‘‘अब नेत्रबंद करो और त्रिवेणी का जल लिये हुए स्वयं को अपने पिता के पास पहुँचा हुआ पाओ । ब्राह्मणपुत्र ने नेत्रबंद किये, फिर देखा कि वह त्रिवेणी के जल से गागर भरकर पिताजी के पास पहुँच गया है । 

गंगाजी की महिमा के विषय में भगवान व्यासजी ‘पद्म पुराण में कहते हैं : ‘‘अविलंब सद्गति का उपाय सोचनेवाले सभी स्त्री-पुरुषों के लिए गंगाजी ही एक ऐसा तीर्थ हैं, जिनके दर्शनमात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।

भगवान शंकर नारदजी से कहते हैं : ‘‘समुद्रसहित पृथ्वी का दान करने से मनीषी पुरुष जो फल पाते हैं, वही फल गंगा-स्नान करनेवाले को सहज में प्राप्त हो जाता है । राजा भगीरथ ने भगवान शंकर की आराधना करके गंगाजी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा था । जिस दिन वे गंगाजी को पृथ्वी पर लेकर आये वही दिन ‘गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है । गंगा दशहरे के दिन गंगाजी में गोता लगाने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है ।
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