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बालक की देशभक्ति

बालक की देशभक्ति

तपती दोपहरी में अरावली की पर्वतमालाओं के बीच राणाप्रताप अपने पुत्र, पत्नी व नन्ही बेटी को साथ लिये किसी नये सुरक्षित स्थान की खोज में आगे बढ़े जा रहे थे । यह चित्तौड़ की पराधीनता का समय था । अकबर के सैनिक इस पहाड़ी के चप्पे-चप्पे में फैले हुए थे । ‘न जाने कब, कहाँ शत्रु-सैनिक आ पहुँचें ? इस आशंका से राणाप्रताप आज यहाँ तो कल वहाँ इस प्रकार जगह पर जगह बदलते जा रहे थे । कभी-कभी तो ऐसे अवसर भी आते कि उन्हें अधपका भोजन छोड़कर भागना पड़ता । दो-दो, तीन-तीन दिन तक निराहार रहना पड़ता या फिर कंद-मूल खा लेते । 

राणा तो फौलादी शरीर के थे परंतु रानी और दो सुकुमार बालकों ने तो महल से बाहर कभी कदम भी नहीं रखे थे । पथरीले रास्ते पर चल-चलकर उनके पैरों में छाल हो रही थी परंतु स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए उन्हें सब पीड़ाएँ स्वीकार थीं 

 ऐसे विपदा के क्षणों में जंगली भीलों ने उनकी खूब सहायता की । उन्हीं भीलों में पुंगा नामक एक अत्यंत स्वामिभक्त भील था । वह प्रताप के अंगरक्षक दल का प्रमुख सदस्य था । राणाप्रताप की दृढ-प्रतिज्ञा और देशप्रेम पर वह पूर्णतया न्योछावर था । उसके परिवार में केवल दो सदस्य थे - उसकी पत्नी और इकलौता पुत्र दुद्धा । पुंगा यदा-कदा अपने परिवार का हालचाल जानने घर आ जाया करता था । तब वह बालक दुद्धा को राणाप्रताप की वीरता के कारनामे सुनाता और मातृभूमि के प्रति उनके प्रगाढ प्रेम का वर्णन करता, इससे दुद्धा का हृदय राणाप्रताप के प्रति श्रद्धा से अभिभूत हो उठता ।

 एक समय राणाप्रताप की प्राणरक्षा करते-करते पुंगा मुगल सैनिकों के हाथों वीरगति को प्राप्त हो गया । राणाप्रताप अपने निकटतम स्वामिभक्त सेवक को खो बैठे । अपने विश्वसनीय, आज्ञाकारी सेवक की मृत्यु का
समाचार पाकर प्रताप अत्यंत दुःखी हो गये, इस कारण उन्होंने उस दिन भोजन भी नहीं किया । समय बीतता गया । पुंगा का पुत्र दुद्धा अब 12 वर्ष का हो चुका था। एक बार राणाप्रताप एक पहाडी इलाके में ठहरे हुए थे, वहाँ से दुद्धा की बस्ती नजदीक थी । बस्ती के भील बारी-बारी से प्रतिदिन राणाप्रताप के लिए भोजन पहुँचाया करते थे । आज दुद्धा की बारी थी परंतु उसके घर में अन्न का दाना भी नहीं था । दुद्धा की माँ पडोस से आटा माँगकर ले आयी और रोटियाँ बनाकर दुद्धा को देते हुए बोली : ‘‘ले, यह पोटली राणा को दे आ। दुद्धा बडी प्रसन्नता से पहाड़ी पत्थरों-चट्टानों को कूदता-फाँदता तेजी-से दौड़ा जा रहा था । 

पहाड़ी के चारों ओर अकबर के सैनिक घेरा डाले हुए थे । उसे इस तरह दौड़ते देखकर एक सैनिक को कुछ शंका हुई । उसने पूछा : ‘‘क्यों रे ! इतनी जल्दी-जल्दी कहाँ भागा जा रहा है ? दुद्धा ने कोई उत्तर नहीं दिया पर अपनी चाल और तेज कर दी । ‘‘अरे बहरे ! कौन है ? कहाँ जा रहा है ? तुझे सुनायी भी देता है या नहीं ? रुक जा ! मुगल सैनिक उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने लगा । लेकिन वह भला उस चपल भील बालक को कैसे पकड़ पाता ? वह लड़खड़ाकर एक चट्टान पर धड़ाम-से गिर पड़ा, परंतु गिरते-गिरते उसने अपनी कटार से दुद्धा की कलाई अलग कर दी । खून का फव्वारा बह निकला, दुद्धा के वस्त्र रक्तरंजित हो गये परंतु वह देशभक्त बालक दौड़ता ही रहा । बस, उसे तो एक ही धुन थी - कैसे भी करके राणा तक रोटियाँ पहुँचानी हैं । 

रक्त बहुत बह चुका था । अब दुद्धा की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा । उसे लगने लगा कि अब उसके प्राण न बचेंगे । वह पूरी शक्ति से दौड़ने लगा और जंगल की झाड़ियों में गायब हो गया । 
मुगल सैनिक हक्का-बक्का-सा रह गया कि ‘आखिर यह बालक कौन था ? कहाँ गया ?... दुद्धा तेजी-से अपने गंतव्य स्थान की ओर बढ़ा जा रहा था । अभी अपनी मंजिल के नजदीक ही पहुँचा था कि चकराकर गिर पड़ा । उसके एक हाथ से रक्त की धारा बह रही थी और दूसरे हाथ में रोटी की पोटली थी । वहीं से उसने राणा को पुकारा : ‘‘राणाजी... !!

आवाज सुनकर प्रताप गुफा से बाहर आये । दुद्धा के हाथ से रक्त बहता देखकर उन्होंने उस पर पट्टी बाँधी, परंतु रक्त अधिक बह चुका था । उसके मुँह पर पानी के छींटें मारे, एक बार उसने आँखें खोलीं और लड़खड़ाती आवाज में बोला : ‘‘राणाजी ! ...ये... रोटियाँ... माँ ने... भिजवायी हैं । ...अब मैं... जा रहा हूँ । मेरी माँ.... अकेली है... अब आप ही उसके आधार हो... उसका ख्याल रखना । 
और उस वीर बालक की आँखें सदा के लिए बंद हो गयीं । राणाप्रताप की आँखों से निर्झर फूट पड़े । उनके मुख से शब्द निकले : ‘‘धन्य है तुम्हारी देशभक्ति !"

 दुद्धा ने अद्भुत साहस एवं धैर्य का परिचय देकर अपने माता-पिता एवं राष्ट्र का भी नाम रोशन कर दिया । आज भी जब राणाप्रताप के देशप्रेम और शौर्य की गाथा गायी जाती है तो उन्हें विधर्मी शासकों से लोहा लेने में साथ देनेवाले इन वीरों को अवश्य याद किया जाता है ।
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