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दिव्य संस्कार से दिव्य जीवन

दिव्य संस्कार से दिव्य जीवन

मेरी नानी मर गयी थी तो श्मशान में ले गये। अर्थी पर हिलचाल होती देख रस्सियाँ खोलीं तो नानी उठ गयी और पैदल चलकर घर आयी। हम 10-12 साल के थे तब नानी से पूछते थेः "नानी ! तुम मर गयी थी, फिर क्या हुआ था ?"

▪नानी बतातीः "क्या पता क्या हुआ लेकिन मैंने उधर देखा कि यह तो नरक है, ये यमदूत हैं तो मैंने कहाः "मुआ ! मेरे को इधर क्यों लाये ? यहाँ तो पापियों को लाया जाता है। मैंने तो ૐकारवाला गुरुमंत्र लिया है।"

यमदूत ने पूछाः "अरे, तुम्हार नाम हेमीबाई है न ?"

"हाँ, लेकिन हेमीबाई तो टंडा आदम में हजारों होंगी, कौन-सी हेमीबाई?"

यमदूत बोलाः "हेमीबाई पोहूमल ?"

▪देखो, मौत के समय भी हौंसला बुलन्द है नानी का ! यमपुरी में यमदूतों को डाँटती है। मेरी नानी ऐसी जबरदस्त, मजबूत थी।

नानी बोलीः "नहीं, नहीं। पोहूमल-फोहूमल हमारे पति का नाम नहीं है।"

"तो तुम्हारे पति का क्या नाम है, बोलो ?"

"हम लोग नहीं बोलते पति का नाम, ʹपʹ पर है तुम बोलते जाओ !"

"हेमी बाई प्रेमकुमार ?"

"नहीं, कुमार हटा दे, पीछे चंद लगा दे।"

"हेमीबाई प्रेमचंद ?"

"हाँ बेटे हाँ ! तेरा भला हो।"

यमराज बोलेः "अरे, ये तो हेमी बाई प्रेमचंद है, हेमीबाई पोहूमल को लाना था ! जाओ, इऩ्हें जल्दी छोड़कर आओ।"

▪फिर मेरे को इस शरीर में छोड़ गये तो मैं उठकर चल के आयी।"

तो मेरी नानी ने यमपुरी में यमदूतों व यमराज को डाँटा और यमराज ने अपनी गलती मानकर फिर नानी के प्राण वापस भेजे। उसके बाद नानी 39 साल तक और जीवित रही। नानी ने 100 साल की उम्र पार की होगी।

▪शरीर मरता है पर उसके बाद भी तुम रहते हो। स्वर्ग में जाना है, नरक में जाना है, दूसरा  शरीर लेना है तो तुम रहते हो न ! बेवकूफी से मृत्यु का भय लगता है। जो आत्मा सो परमात्मा। आत्मा परमात्मा एक है तो मरने का डर छोड़ दो, तुम मर ही नहीं सकते हो। तुमको भगवान भी नहीं मार सकते हैं।

जो यमपुरी में जाने के बाद भी दम मार के यमराज से अपना जीवन ले आयी, उस नानी का मैं दोहता (नाती) हूँ।

जिन्होंने नीम के पेड़ को आज्ञा देकर चला दिया, जिससे मुसलमान भाइयों ने जिन्हें आदर से ʹसाँईं लीलाशाहʹ नाम से सम्बोधित किया, ऐसे लीलाराम में से ʹसाँईं लीलाशाहजी बापूʹ बने महापुरुष का तो मैं शिष्य हूँ। जो नीम के पेड़ को आज्ञा करके स्थानांतरित कर देते हैं कि ʹसही जगह पर जाकर रह !ʹ उन महाप्रभु का मैं प्यारा हूँ। हमारे खून की परम्परा कैसी है देखो !

▪तुम्हारे बापू का जन्म तो सुबह होने वाला था,प्रसूति कराने वाली दाई भी आ गयी थी लेकिन माँ ने मंदिर में जाकर भगवान को बोला कि ʹप्रभु ! अभी प्रसूति न हो, मुझे अभी छाछ-दही आदि बाँटना है। आज के दिन मेरी यह सेवा न रह जाय।ʹ तो भगवान ने तुम्हारे बापू को आने से रोक दिया। माँ जब सब काम करके निवृत्त हुई, फिर दाई को बोलीः "अब चल।"

▪माँ बताती थी कि ʹफिर आराम से प्रसूति हुई और तुम्हारी प्रसूति के एक दिन पहले कोई अजगैबी सौदागर एक बड़ा झूला लेकर आया था।ʹ झूला भी इतना लम्बा चौड़ा, बढ़िया पलंग जैसा था। मेरे पिता जी नगरसेठ थे, जमींदार थे, खूब सम्पदावान थे। सौदागर देने आया तो बोलेः "हम तो नहीं लेते।"

वह बोलाः "आपके घर बालक आने वाला है इसलिए झूला लाया हूँ।"

"तुम क्यों झूला दोगे ?"

"मुझे रात को सपना आया था।"

भगवान ने मेरे लिए सौदागर के द्वारा पहले झूला भेजा, बाद में मेरा जन्म हुआ। ऐसे भगवान का तो मैं प्यारा हूँ।

▪ऐसा नहीं कि मैं अकेला प्यारा हूँ, तुम भी हो। हम सभी उसके प्यारे हैं। जो उसको जितना मानता है, वह उसके लिए उतना प्यारा हो जाता है। मैं तो हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि आप भगवान को अपना मानो, वे आपके अपने प्यारे हैं तो आप मेरे से भी ज्यादा आगे निकल सकते हो। भगवान को अपना मानो, प्यारा मानो तो भगवान आपको बुद्धियोग देंगे। फिर ʹगुरु तो गुड़ रह जायेगा, चेला शक्कर बन जायेगाʹ पर हमें आनंद होगा।

✒प्रश्न : पुनः जीवित होने के बाद नानीजी कितने साल और जीवित रहीं..?
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