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गुरु की सामर्थ्य की परीक्षा कभी ना करें

गुरु की सामर्थ्य की परीक्षा कभी ना करें

खोज लो किसी रहनुमा को और उनके कदमों में अपना सिर रखकर समर्पण कर दो।

एक गृहस्थ ब्राह्मण था।साधु-संतों के प्रति उसकी खूब प्रीति थी किंतु उसके जीवन में एक समर्थ सदगुरू की कमी हमेशा खटकती थी। वह रोज विचार करता कि काश! कोई समर्थ सदगुरु मिल जाए।
 एक दिन उसने सुना कि कोई महा सिद्धयोगी गांव के मंदिर में पधारे हैं। ब्राह्मण यह सुनकर सेवा और दर्शन के लिए मंदिर में पहुंच गया। खूब तेजस्वी एवं आभायुक्त योगी के दर्शन करके वह प्रभावित हुआ और वह उनके समक्ष साष्टांग दंडवत प्रणाम करके बैठ गया। वे योगी थे बाबा गोरखनाथ।

ब्राहमण पूर्ण निष्ठा से उनकी सेवा करने लगा।वह रोज बाबाजी के लिए खीर बनाकर ले आता। गोरखनाथ जी का सत्संग सुनकर उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि ये ही मेरे गुरु हैं।

थोड़ी समय तक वहाँ रहकर गोरखनाथजी गाँव छोड़कर जाने लगे तब वह ब्राह्मण उनके साथ निकल पड़ा। गुरु की सेवा करना एवं रोज दोपहर को उन्हें खीर खिलाना ही ब्राह्मण नित्यक्रम हो गया ।

कई वर्षों तक इस प्रकार सेवा करते-करते एक दिन उसके मन में विचार आया : 'यह तो मैंने कइयों के मुंह से सुना है कि मेरे गुरु समर्थ है किंतु मुझे तो ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ....'बस, ब्राह्मण के मन में यह विचार उठा तो फिर उसने ब्राह्मण का पीछा ही ना छोड़ा।

गोरखनाथ जी तो अंतर्यामी थे। शिष्य के मन की बात जान गए। शिष्य को गुरू की सेवा निष्काम भाव से करनी चाहिए। गुरु के सामर्थ्य की परीक्षा करना यह तो अनाधिकार चेष्टा कही जाएगी। यह सोचकर गोरखनाथजी ने शिष्य को सीख देने का निश्चय किया।

दोपहर में जब वह ब्राह्मण खीर लेकर आया तब गोरखनाथ जी ने उसे सामने ही बैठने के लिए कहा। गोरखनाथ जी ने खीर खाकर शिष्य से कहा :"अब यहां दो गड्ढे खोद दे।"
शिष्य ने गुरु की आज्ञा के अनुसार दो गड्ढे पास-पास खोद दिए। जैसे ही गड्ढे तैयार हुए वैसे ही गोरखनाथ जी ने पहले गड्ढे के पास जाकर वमन किया तो केवल दूध निकला और दूसरे के पास जाकर वमन किया तो केवल चावल निकले ! 

शिष्य देखता ही रह गया! गोरखनाथजी बोले : "आज तक तूने जीतनी बार खीर खिलाई है वह तुझे पूरी की पूरी वापस करता हूँ। दूध अलग और चावल अलग। जा,ले जा।"
 शिष्य को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह गुरु के चरण पकड़कर,रो-रोकर क्षमायाचना करने लगा। वह बोला :" गुरुदेव !मुझे क्षमा कर दें। मैं अज्ञानी मूर्ख कैसे विचार कर बैठा ? कृपा करके मुझे निष्काम सेवा का आशीर्वाद दें ।"
सच्चे हृदय से शिष्य द्वारा की गई क्षमा याचना गुरु गोरखनाथ ने स्वीकार कर लिया।

📚ऋषि प्रसाद/दिसम्बर 97
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