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लाटू बने अद्भुतानंद महाराज

लाटू बने अद्भुतानंद महाराज

एक ऐसा भक्त जो ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था फिर अद्भुत संकल्पशक्ति का धनी हो गया...

रामकृष्ण परमहंस जिनको ठाकुर भी बोलते थे उनके कई एम.बी.बी.एस.,एल.एल.बी. पढ़े भक्त भी थे और सीधे-सादे भक्त भी।

उनमें से एक ऐसा भक्त था जो पढ़ा-लिखा तो ज्यादा नहीं था और सिर्फ भावुक भी नहीं था। भावना के साथ थोड़ी सूझबूझ भी रखता था लेकिन पढ़े-लिखों को देखकर उसे अपने भविष्य के बारे में चिंता होती थी। उसका नाम था लाटू।

लाटू ने एक बार रामकृष्ण परमहंस को कहा कि "ठाकुर ! फलाने इतने विद्वान हैं,फलाने इतने हैं... मैं लाटू क्या लट्टू की नाई घूमता रहूँगा ?
 मेरा क्या होगा,मेरा पता नहीं। राम मंदिर में गाते हैं भक्त --- नहिं विद्या  नहिं बाहुबल,नहीं गाँठिन को डैम..... मैं तो ऐसा लाटू हूँ!"

ठाकुर ने कहा :"तो क्या है,तू काहे को चिंता करता है?  मैं हूँ न !"
"तो ठाकुर! मैं क्या करूं?"

 बोले :"अरे तू मेरा ध्यान किया कर,मेरा नाम जपा कर। सब हो जाएगा।"

लाटू की बाँछें खिल गई ,आंखों में चमक दौड़ गयी। 'यह तो बड़ा आसान है ! भगवान जो लीलाएँ करके गए हैं उनको शास्त्रों में पढ़कर उनका अभ्यास करना तो बड़ा कठिन है।गुरु महाराज तो साक्षात हैं!"

वह लग गया। जैसे भगवान की लीला सुनते हैं,चर्चा करते हैं,वैसे रामकृष्ण का नाम जपें, उनका ध्यान करें,उनकी चर्चा-लीला अहोभाव से सुने। ठाकुर की आज्ञा ही उसके लिए सर्वस्व हो गई ।

रामकृष्ण को देखते-देखते शांत,मौन हो जाए,एकांत में रहे। तो शुद्ध अंत:करण में आत्मविश्रांति मिलने लगी।

'लाटू' में से 'लाटू महाराज' नाम पड़ा। उसके बाद अद्भुत संकल्प शक्ति आ गई । जो संतो के पास  ऊंचाइयां होती हैं वहीं इस लाटू के पास देखकर रामकृष्ण के शिष्य विवेकानंद उनको 'अद्भुतानंद महाराज' बोलते थे ।
अद्भुत है उनका कला-कौशल्य! शास्त्र-वचन उन्होंने अपने जीवन में लाकर आम आदमी के लिए सरल कर दिया । लोग तो बोल देते हैं ध्यान मूलं गुरुमूर्ति... लेकिन अप्रत्यक्ष कर दिया।

रामकृष्ण के खास उन्नत शिष्यों में अद्भुतानंद महाराज का बड़ा ऊँचा आदर,ऊँचा दर्जा था।

सच्चे गुरु शिष्य को शिष्यत्व,जीवत्व से हटाकर ब्रह्मत्व में विश्रांति अथवा जगाने की ताक में रहते हैं।

📚ऋषि प्रसाद /जून २०१३
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