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बीरबल का न्याय

बीरबल का न्याय

एक दिन बादशाह अकबर का दरबार भरा हुआ था । बीरबल भी सभा में उपस्थित था । अचानक किसीके रोने-चीखने की आवाज सबको सुनायी पड़ी । 

बादशाह ने आदेश दिया :- ‘‘ जो भी है उसे अंदर लाया जाए !! "

एक बुढ़िया को अंदर लाया गया ।

बादशाह के पूछने पर उसने सिसकते हुए बताया कि :- ‘‘ मैं दो महीने पहले तीर्थयात्रा करने गयी थी और जाने से पहले एक कीमती रत्न मेरे पड़ोस में रहनेवाले सेठ के पास अमानत के तौर पर रखवा गयी थी । वापस आने के बाद जब मैं रत्न लेने गयी तो सेठ ने मुझे झुठला दिया और बोला कि ‘ तू तो अपना रत्न पहले ही ले जा चुकी है...। मेरे खूब समझाने पर भी सेठ नहीं माना और मुझे अपमानित करके बाहर निकलवा दिया ।

बादशाह ने सेठ को बुलवाया । सेठ बिल्कुल निर्दोषता से बोला :- ‘‘ जहाँपनाह ! यह बुढ़िया झूठ बोल रही है । मैं तो एक सीधा-सादा साहूकार हूँ । बुढ़िया के माँगते ही मैंने रत्न दे दिया था । बादशाह :- ‘‘ तुमने रत्न लौटा दिया है, इसका क्या सबूत है ??

सेठ बोला :- ‘‘ एक नहीं तीन-तीन गवाह हैं । जिनके सामने मैंने रत्न लौटाया था वे मेरे साथ आये हैं ।

बादशाह ने तीनों से पूछताछ की । 

उन सभी ने सेठ द्वारा बुढ़िया को रत्न लौटाये जाने की बात कबूल की । बुढ़िया झूठी साबित हुई । उसे दरबार से बाहर करवा दिया गया । इस घटना के बाद बीरबल बादशाह से बोला :- ‘‘ जहाँपनाह ! मुझे दाल में कुछ काला लगता है । मेरे हिसाब से बुढ़िया सच कह रही थी । 

बादशाह ने बुढ़िया व तीनों साक्षियों को फिर से बुलवाया । बीरबल ने उस बूढ़ी माई से पूछा :- " माँ ! ठीक से याद कीजिये और बताइये कि सेठ ने आपको रत्न दिया है कि नहीं ❓

बुढ़िया की आँखों में आँसू छलक आये । वह बोली :- ‘‘ साहब ! मुझ गरीब के पास अपनी सच्चाई पेश करने के लिए कोई सबूत नहीं है पर मेरा ईश्वर साक्षी है कि सेठ ने मुझे फूटी कौड़ी भी नहीं दी है । 

सेठ बोला :- ‘‘ कैसे नहीं दी है ? तीन-तीन लोगों के सामने मैंने रत्न तेरे हाथों में दिया है ।

बीरबल ने गवाहों को अलग-अलग बुलाकर पूछा :- ‘‘ अगर आपने सेठ को रत्न देते देखा है तो बताइये, वह रत्न किस आकार का था ?? 

पहला गवाह सब्जीवाला था ।

 उसने झट-से टोकरी में से एक गाजर निकाली और बोला :- ‘‘ रत्न बिल्कुल इस प्रकार लम्बा-सा था । "

दूसरा गवाह चरवाहा था ।

 वह बोला :- ‘‘ साहब ! रत्न तो बिल्कुल मेरी भूरी गाय के सींग जैसा नुकीला था । "

तीसरा गवाह फलवाला था ।

 वह सेब दिखाते हुए बोला :- ‘‘ वह बिल्कुल ऐसा गोल-मटोल था । '

तीनों के अलग-अलग जवाबों से स्पष्ट था कि रत्न किसी ने भी नहीं देखा है और तीनोें गवाह झूठे हैं । सेठ की पोल खुल गयी और उसे रत्न लौटाना पड़ा.... साथ ही हेराफेरी के जुर्म में एक हजार सोने की मुहरें भी दंडस्वरूप देनी पड़ी । बुढ़िया ने गदगद होकर बीरबल की सराहना की और आशीर्वाद देती हुई घर चली गयी।

"लोभ मूल है दुःख को, लोभ पाप को बाप ।
लोभ फँसे जो मूढ़ जन, सहै सदा संताप ।।"
लोभ ही पाप का कारण है ।

✍🏻सेठ की तरह जो भी लोभ के वश होकर छल-कपट करते हैं, उन्हें अंततः पछतावा ही हाथ लगता है । यहाँ छूट भी जाय तो परलोक में, नरकों में और नीच योनियों में उन्हें यातनाएँ ही सहनी पड़ती हैं तथा बीरबल की तरह जो भक्त और सच्चे लोगों के पक्ष में.... परदुःख मिटाने में.... ईश्वरप्रदत्त बुद्धि व योग्यता का सदुपयोग करते हैं वे आशीर्वाद एवं आत्मसंतोष पाते हैं । सत्य और न्याय का पक्ष लेनेवाला बीरबल सद्गति का पात्र है । असत्य और धोखाधड़ी का आश्रय लेनेवाले मनुष्य-जन्म बरबाद करते हैं और नरकों में नीच योनियों में भटकने का सामान इकट्ठा करते हैं । अब पुण्यात्मा पाठक अपने श्रेष्ठ मार्ग पर.... सद्गुणों पर.... सच्चाई पर.... अडिग रहेंगे ।
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