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विकास की कुंजी : सेवा

विकास की कुंजी : सेवा

बंगाल में एक साधु पुरुष हो गये,जिनका नाम था नाग महाशय। ʹडॉक्टरी' व्यवसाय पैसा कमाने के लिए नहीं अपितु सेवा करने के लिए है...ʹ ऐसी उत्तम भावना से ही वे इस व्यवसाय में लगे थे।

एक गरीब वृद्धा के बीमार होने की सूचना पर वे उसको देखने के लिए गये। थरथऱ कँपा देने वाली ठंड में भी वे लम्बा मार्ग तय करके उस बीमार वृद्धा की झोंपड़ी में पहुँचे। 

नाग महाशय ने उसकी जाँच करके दवा देते हुए
कहाः "जीर्ण-शीर्ण, फटे कम्बल से तो आपको सर्दी लग जायेगी !" ऐसा कहकर मानो ʹउस वृद्धा में अपना ही प्रभु हैʹ ऐसा सोचकर उन्होंने उसे अपना नया कम्बल ओढ़ा दिया और चले गये। जरूरतमंद की बिना दिखावे की हुई सेवा से जो सच्चा सुख व आत्मसंतोष मिलता है, वह विलक्षण होता है। 
क्यों विद्यार्थियो ! आप भी करोगे न बिना दिखावे की सेवा ?

हे भारत के लाल ! तुम भी बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या उद्योगपति आदि बनोगे। उस वक्त तुम भी अपना लक्ष्य केवल पैसे कमाना ही न रखना वरन् किसी गरीब-गुरबे की सेवा करके उसके अंतःकरण में विराजमान परमात्मा के आशीर्वाद मिलें, ऐसी शाश्वत कमाई करने का लक्ष्य भी रखना। 

शाबाश वीर ! प्रभु के प्यारे ! ૐ आनंद... ૐसाहस.... ૐૐसेवा और
स्नेह.... ૐ ૐप्रभुनाम और प्रभुध्यान.... सभी सदगुणों को विकसित करने की यह मुख्य कुंजी है।

 जवाब दें और जीवन में लायें। 

बड़े बनकर क्या केवल पैसा कमाना ही लक्ष्य होना
चाहिए ? यदि नहीं तो क्या लक्ष्य होना चाहिए ?

✍🏻हे विद्यार्थियो ! तुम्हारे जीवन में यदि परहित की भावना होगी, निष्काम कर्मयोग की भावना होगी तो तुम अवश्य अपना, अपने माता-पिता का एवं राष्ट्र का गौरव बढ़ा सकोगे।
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