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पितृगणों की तृप्ति का सरल उपाय

पितृगणों की तृप्ति का सरल उपाय

विष्णु पुराण के अनुसार, श्राद्धकाल में भक्तिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन कराना चाहिए । इसमें असमर्थ होने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कच्चा धान्य और थोड़ी दक्षिणा देने से भी श्राद्ध पूर्ण माना जाता है ।

यदि इतना करने में भी कोई समर्थ न हो तो किसी भी श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रणाम करके एक मुट्ठी तिल दें अथवा पितरों के निमित्त पृथ्वी पर भक्ति एवं नम्रतापूर्वक सात-आठ तिलों से युक्त जलांजलि दे दें । यदि इसका भी अभाव हो तो कहीं-न-कहीं से एक दिन की घास लाकर प्रीति और श्रद्धापूर्वक पितरों के उद्देश्य से गौ को खिलाएं। 

इन सभी वस्तुओं का अभाव होने पर वन में (अथवा एकांत पवित्र स्थान में) जाकर अपने कक्षमूल (बगल) सूर्य आदि दिक्पालों को दिखाते हुए उच्च स्वर से यह कहें :

न मेऽस्ति वित्तं न धनं च नान्य- च्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि । तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वत्र्मनि मारुतस्य ।।

‘मेरे पास श्राद्ध-कर्म के योग्य न वित्त है, न धन है और न कोई अन्य सामग्री है। अतः मैं अपने पितृगण को नमस्कार करता हूँ । वे मेरी भक्ति से ही तृप्ति-लाभ करें, मैंने अपनी दोनों भुजाएँ आकाश में उठा रखी है । (विष्णु पुराण : 3.14.30) इस प्रकार अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार
सभी व्यक्ति पितृगणों को तृप्त कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं ।
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