माँ का ऋण कैसा

माँ का ऋण कैसा

स्वामी विवेकानंद को किसी युवक ने कहा : ‘‘महाराज ! कहते हैं कि माँ का ऋण चुकाना

कठिन होता है ऐसा तो क्या है माँ का ऋण ?’’

विवेकानंदजी : ‘‘इस प्रश्न का उत्तर प्रायोगिक चाहते हो ?’’

‘‘हाँ महाराज !’’

‘‘थोड़ी हिम्मत करो, यह जो पत्थर पड़ा है, इसको अपने पेट पर बाँध लो और ऑफिस में काम करने जाओ शाम को मिलना ’’ पेट पर ढाई-तीन किलो का पत्थर बँधा हो और कामकाज करे तो क्या हालत होगी ?

आजमाना हो तो आजमा के देख लेना नहीं तो मान लो, क्या हालत होती है ! वह थका-माँदा शाम को लौटा विवेकानंदजी के पास जाकर बोला : ‘‘माँ का ऋण कैसा ?

इसका जवाब पाने में तो बहुत मुसीबत उठानी पड़ी अब बताने की कृपा करें कि माँ का ऋण

कैसा होता है ?’’

‘‘यह पत्थर तूने कब से बाँधा है ?’’

‘‘आज सुबह से ’’

‘‘एक ही दिन हुआ, ज्यादा तो नहीं हुआ न ?’’

‘‘नहीं ’’

‘‘तू एक दिन में ही तौबा पुकार गया जो महीनों-महीनों तेरा बोझ लेकर घूती थी, उसने कितना सहा होगा ! उसने तो कभी ना नहीं कहा अब इससे ज्यादा प्रायोगिक क्या बताऊँ तुझे ?’’

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