ૐ के जप से चमत्कार

ૐ के जप से चमत्कार

Aum Jap Ke Chamatkar

प्रो. मॉर्गन का सुझाव था कि स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन ૐ का जप करके उम्र भर बीमारियों को दूर रख सकता है।

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति के समय पैदा हुई सबसे पहली ध्वनि थी ʹૐʹ, जिसने आकाश, धरती, पाताल समेत समस्त जगत को गुंजायमान कर दिया था। इस पवित्र ध्वनि की महिमा और प्रभाव का लोहा आज पूरी दुनिया मान रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ૐ के माध्यम से न सिर्फ शारीरिक विकार दूर किये जा रहे हैं बल्कि नशे के गर्त में डूब रहे युवाओं को सही राह पर लाने में भी इस पवित्र ध्वनि का प्रयोग किया जा रहा है। हाल ही में ब्रिटेन के एक साइंस जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से ૐ की महत्ता स्वीकार की गयी है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि कुछ आँतरिक बीमारियाँ जिनका इलाज आज तक मैडीकल साइंस में उपलब्ध नहीं है, उनमें केवल ૐ के नियमित जप से आश्चर्यजनक रूप से कमी देखी गयी है। खासकर पेट, मस्तिष्क और हृदय सम्बन्धी बीमारियों में ૐ का जप रामबाण औषधि की तरह काम करता है।

ʹरिसर्च एंड एक्सपेरिमेंट इंस्टीच्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसʹ के प्रमुख प्रो. जे. मार्गन और उनके सहयोगियों द्वारा सात साल से हिन्दू धर्म के प्रतीक चिह्न ૐ के प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा था। इस दौरान उन्होंने मस्तिष्क और हृदय की विभिन्न बीमारियों से पीड़ित 2500 पुरुषों तथा 2000 महिलाओं को परीक्षण के दायरे में लिया। इन सारे मरीजों को केवल वे ही दवाइयाँ दी गयीं, जो उनके जीवन को बचाने के लिए जरूरी थीं, बाकी सारी  दवाइयाँ बन्द कर दी गयीं। प्रतिदिन सुबह 6 बजे से 7 बजे तक एक घंटा इन लोगों को साफ-स्वच्छ खुले वातावरण में योग्य प्रशिक्षकों द्वारा ʹૐʹ मंत्र का जप करवाया गया।

इस दौरान उन्हें विभिन्न ध्वनियों और आवृत्तियों में ૐ का जप करने को कहा गया। हर तीन महीने बाद मस्तिष्क, हृदय के अलावा पूरे शरीर का स्कैनिंग किया गया। चार साल तक लगातार ऐसा करने के बाद जो रिपोर्ट आयी वह चौंकाने वाली थी।

लगभग 70 फीसदी पुरुष और 82 फीसदी महिलाओं में ૐ का जप शुरु करने से पहले बीमारियों की जो स्थिति थी, उसमें 90 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गयी। इसके अलावा एक और महत्त्वपूर्ण प्रभाव सामने आया, वह है नशे से मुक्ति का। नशे के आदी हो चुके लोगों ने भी ૐ के जप से नशे की लत को दूर किया। प्रो. मार्गन का सुझाव था कि स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन ૐ का जप करके उम्र भर बीमारियों को दूर रख सकता है। प्रो. मार्गन कहते हैं कि विभिन्न आवृत्तियों और ध्वनियों के उतार-चढ़ाव से पैदा करने वाले कम्पन मृत कोशिकाओं को पुनर्जीवित करते हैं और नयी कोशिकाओं का निर्माण करते हैं। ૐ के जप से मस्तिष्क से लेकर नाक, गला, हृदय और पेट में तीव्र तरंगों का संचार होता है। इस कारण पूरे शरीर में रक्त का संचरण भी सुव्यवस्थित होता है। अधिकांश बीमारियाँ रक्तदोष से पैदा होती है, इसलिए ૐ का जप रक्तविकार दूर करके शरीर में स्फूर्ति बनाये रखता है। प्रो. जे. मार्गन और उनके सहयोगियों द्वारा किये गये इस अनुसंधान से विश्व के लोगों का ध्यान इस तथ्य की ओर आकृष्ट हो रहा है। हजारों वर्ष पूर्व से हमारे शास्त्रों में ૐ के विषय में विलक्षण जानकारियाँ उपलब्ध हैं।

ʹश्रीमद् भगवद् गीताʹ में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हैः

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

   यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमं गतिम्।।

ʹजो पुरुष ʹૐʹ इस एक अक्षररूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर का त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है।ʹ (8.13)

महर्षि पतंजलि प्रणीत ʹयोगदर्शनʹ में कहा गया है।

तस्य वाचक प्रणवः। तज्जपस्तदर्धभावनम्। (समाधिपाद, सूत्रः27-28)

ʹईश्वर का वाचक (नाम) प्रणव (ૐकार) है। उस ૐकरा का जप, उसके अर्थस्वरूप परमेश्वर का पुनःपुनः स्मरण-चिंतन करना चाहिए।ʹ

महर्षि वेदव्यासजी कहते हैं-

मन्त्राणां प्रणवः सेतुः.... ૐ मंत्रों को पार करने के लिए अर्थात् सिद्धि के लिए पुल के सदृश है।

गुरु नानकदेव जी ने भी कहा हैः

शब्द जप रे, कार गुरमुख तेरे।

अस्वर सुनहु विचार, अस्वर त्रिभुवन सार।

प्रणवों आदि एक ओंकारा, जल, थल महियल कियो पसारा।।

इक कार सतिनामु।

बौद्ध धर्म का परम पवित्र मंत्र हैः ओं मणि पदमे हुँ।

ʹप्रश्नोपनिषद्ʹ में महर्षि पिप्पलाद कहते हैं-

ʹहे सत्यकाम ! निश्चय ही यह जो ૐकार है वही परब्रह्म और अपर ब्रह्म भी है।ʹ (प्रश्नोपनिषद् 5.2)

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