भूलकर भी ना करे...

श्री गणेश स्तुति

गणेश उपासना

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गणेशजी का अनोखा संयम

गणेशजी का अनोखा संयम

"संयमशिरोणि,जितेन्द्रियों में अग्रगण्य,पार्वतीनंदन,श्रीगणेश का चंदन-विलेपित,तेजस्वी विग्रह देखकर तुलसीदेवी का मन उनकी ओर बरबस आकृष्ट हो गया।"

 ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड में कथा आती है : ब्रह्मकल्प की बात है । नवयौवनसंपन्ना परम लावण्यवती तुलसीदेवी भगवान नारायण का स्मरण करती हुई तीर्थों में भ्रमण कर रही थी । वे पतितपावनी श्रीगंगाजी के पावन तट पर पहुँचीं, तब उन्होंने देखा कि वहाँ पीताम्बर धारण किये नवयौवनसंपन्न, परम सुंदर निधिपति भगवान श्रीगणेश ध्यानस्थ अवस्था में बैठे हैं । उन्हें देखकर तुलसीदेवी सहसा कह उठीं :‘‘अत्यंत अद्भुत और अलौकिक रूप है आपका !" 

संयमशिरोणि, जितेन्द्रियों में अग्रगण्य पार्वतीनंदन श्रीगणेश का चंदन-विलेपित तेजस्वी विग्रह देखकर तुलसीदेवी का मन उनकी ओर बरबस आकृष्ट हो गया । विनोद के स्वर में उन्होंने गणेशजी से कहा : ‘‘गजवक्त्र ! शूर्पकर्ण ! एकदंत ! घटोदर ! सारे आश्चर्य आपके ही शुभ विग्रह में एकत्र हो गये हैं । किस तपस्या का फल है यह ?"
    उमानंदन एकदंत ने शांत स्वर में कहा : ‘‘वत्से ! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो ? यहाँ किस हेतु से आयी हो ? माता ! तपश्चरण में विघ्न डालना उचित नहीं । यह सर्वथा अकल्याण का हेतु होता है । मंगलमय प्रभु तुम्हारा मंगल करें ।

 तुलसीदेवी ने मधुर वाणी में उत्तर दिया : ‘‘मैं धर्मात्मज की पुत्री हूँ । मैं मनोऽनुकूल पति की प्राप्ति के लिए तपस्या में संलग्न हूँ । आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कर लीजिये । 
   घबराते हुए गणेशजी ने उत्तर दिया : ‘‘माता ! विवाह बड़ा दुःखदायी होता है । तुम मेरी ओर से अपना मन हटाकर किसी अन्य पुरुष को पति के रूप में वरण कर लो । मुझे क्षमा करो ।"

 कुपित होकर तुलसीदेवी ने गणेशजी को शाप दिया : ‘‘तुम्हारा विवाह अवश्य होगा ।"

 एकदंत गणेश ने भी तुरंत तुलसीदेवी को शाप देते हुए कहा : ‘‘देवी ! तुम्हें भी असुर पति प्राप्त होगा । उसके अनंतर महापुरुषों के शाप से तुम वृक्ष हो जाओगी । पार्वतीनंदन के अमोघ शाप के भय से तुलसीदेवी गणेशजी का स्तवन करने लगीं । 

परम दयालु, सबके मंगल में रत गणेशजी ने तुलसीदेवी की स्तुति से प्रसन्न होकर कहा : ‘‘देवी ! तुम पुष्पों की सारभूता एवं कलांश से नारायण-प्रिया बनोगी । वैसे तो सभी देवता तुमसे संतुष्ट होंगे किंतु भगवान श्रीहरि के लिए तुम विशेष प्रिय होओगी । तुम्हारे द्वारा श्रीहरि की अर्चना कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करेंगे किंतु मेरे लिए तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी ।"

 इतना कहकर गणेशजी तपश्चर्या हेतु बद्रीनाथ की ओर चल दिये ।

कालांतर में तुलसीदेवी वृन्दा नाम से दानवराज शंखचूड़ की पत्नी हुर्इं । शंखचूड़ भगवान शंकर द्वारा मारा गया और उसके बाद नारायण-प्रिया तुलसी कलांश से वृक्षभाव को प्राप्त हो गयीं ।
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सच्ची आजादी पा लो
SirishBehera

सच्ची आजादी पा लो

आज 15 अगस्त के दिन देश आजाद हुआ था तो आज सैर-सपाटे, ‘हा-हा, ही-ही’ में ही खुशियाँ मनाकर अपने को धोखे में नहीं डालना है । इस आजादी के पीछे देशभक्तों ने कितनी कुर्बानियाँ दी हैं ।
हम भगवान को धन्यवाद दें और प्रार्थना करें कि ‘हम कदम-से-कदम मिलाकर चलें, विचार-से-विचार मिलाकर रहें और अपनी आत्मशक्ति को, श्रद्धाशक्ति को, कर्मशक्ति को विकसित करें ।’ तब तो यह आजादी बरकरार रहेगी, बाकी आजादी के उत्सव मना लिये और फूट डालनेवाले लोग हमें फिर से आपसी फूट का शिकार बनाकर हमारी आजादी छीन लें, यह ठीक नहीं । इस बात की सावधानी रखनी चाहिए ।
आज का दिन प्रार्थना का है, सावधानी का है, संयम और सदाचार, साहस और सद्विचार तथा सामर्थ्य बढ़ाने का संकल्प करने का है ।

...तो स्वतंत्रता दिवस पर यही संदेश है कि ‘आप आजादी की खुशियाँ मनाना चाहो तो भले मना लेना, परंतु खुशियाँ मनाने के साथ वे शाश्वत रहें ऐसी नजर रखना । देश को तोड़नेवाले तत्त्वों और अपने को गिरानेवाले विकारों से बचना । ईश्वर-स्मरण व साधन-भजन इन्हींकी ओर लगना ।

* सीख : हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने भारत को आजाद कराने
केलिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी । अब हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी संस्कृति को अपनाकर, भारत को विश्वगुरु बनाने में तत्पर होकर उनकी कुर्बानी को सफल करें ना कि केवल एक दिन स्वतंत्रता दिवस मनाकर पूरा
वर्ष विदेशी संस्कृति के प्रति आकर्षित होकर, उसे अपनाकर उनकी कुर्बानी को व्यर्थ करें ।
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